मुशायरा हिंदू-मुस्लिम एकता के ध्वजवाहक हैं: नदीम जावेद

जौनपुर नामा
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एक शाम मज़हर आसिफ के नाम" अखिल भारतीय मुशायरा एवं कवि सम्मेलन का आयोजन, देश के नामचीन शायरों की रही सहभागिता

जौनपुर, 14 जून (प्रेस विज्ञप्ति) शीराज़-ए-हिंद जौनपुर की प्रसिद्ध सामाजिक एवं साहित्यिक हस्ती स्वर्गीय मज़हर आसिफ की स्मृति में ग्रीनलैंड मैरिज लॉन,शिया कॉलेज रोड,जौनपुर में एक भव्य अखिल भारतीय मुशायरा एवं कवि सम्मेलन का आयोजन "यादों भरी शाम मज़हर आसिफ़ के नाम" से किया गया,जिसमें देश के अनेक प्रसिद्ध शायरों और कवियों ने भाग लिया।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि पूर्व विधायक नदीम जावेद ने स्वर्गीय मज़हर आसिफ को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि जब भी शीराज़-ए-हिंद जौनपुर का स्वर्णिम इतिहास लिखा जाएगा, तब मजहर आसिफ का नाम भी स्वर्ण अक्षरों में अंकित किया जाएगा। उन्होंने जौनपुर की समृद्ध मुशायरा परंपरा पर प्रकाश डालते हुए नगर के अनेक प्रतिष्ठित शायरों का विशेष उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि मुशायरा और कवि सम्मेलन हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब तथा हिंदू-मुस्लिम एकता के सशक्त प्रतीक हैं। उन्होंने शहर के हिंदू कवियों और साहित्यकारों के योगदान को भी नमन किया और कहा कि इस प्रकार की साहित्यिक सभाओं का आयोजन निरंतर होते रहना चाहिए।
उन्होंने कार्यक्रम के संयोजक अहमद ताहा खान, मुशायरे के संचालक पत्रकार अजवद कासमी तथा समस्त आयोजन समिति के सदस्यों की निष्ठापूर्ण मेहनत की सराहना करते हुए कहा कि भविष्य में भी उनका हर संभव सहयोग और सहभागिता बनी रहेगी। नदीम जावेद ने कहा कि उर्दू भाषा के विकास और देश में सामाजिक सौहार्द बनाए रखने में शायरों की भूमिका अत्यंत प्रशंसनीय है।

मुशायरा देर रात से लेकर सुबह तक पूरे उत्साह और गरिमा के साथ चलता रहा। शायरों ने अपने उत्कृष्ट कलाम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कुछ लोकप्रिय अशआर इस प्रकार हैं—


"उनको रुसवाई से लड़ते नहीं देखा हमने,
उनकी इज्जत को उजड़ते नहीं देखा हमने।"
शबीना अदीब

ऐसा नहीं है कि सारा फलक मांग रहे हैं,
हम सिर्फ अपने हिस्से का हक मांग रहे हैं।
स्वयं श्रीवास्तव

तेरे नाज़ उठाऊँ कैसे, मुझे तजुर्बा नहीं है,
मेरा इश्क़ है ये पहला, कोई दूसरा नहीं है।
डॉ सबा बलरामपुरी

शहर के शोर में तन्हाइयाँ हैं,
यहाँ तुम हो मगर वीरानियाँ हैं।
मणिका दुबे

नहीं है तेरी चमक में कोई सूरज,
मैं खुद वहाँ हूँ जहाँ रोशनी नहीं आती।
इकबाल अशहर

होके आबाद भी आबाद से होने से रहे,
जैसे पहले थे तेरे बाद भी होने से रहे।
हिमांशी बाबरा

मेरी तामीर मुकम्मल नहीं होने पाती,
कोई बुनियाद हिलाता है चला जाता है।
अफज़ल इलाहाबादी

कह रहा था कल दारोगा थाने में दीवान से
आ गया है कैश, छोड़ दो सामान से।
कलीम समर

सामने वाले को हल्का जानकर भारी हैं आप
उसका मापदंड देखा, कितने मापदंडी हैं आप।
क़मर अब्बास

इसके अतिरिक्त अख्तर आज़मी, शगुफ्ता अंजुम, रेहान हाशमी, अकरम जौनपुरी, शकील मुबारकपुरी, मुस्तइन जौनपुरी, डॉ. संजय सिंह सागर आदि ने भी अपने सुंदर कलाम से श्रोताओं की भरपूर वाहवाही प्राप्त की।
इस अवसर पर सेंट जोसेफ स्कूल्स ग्रुप के चेयरमैन डॉ. नौमान खान ने उर्दू भाषा के प्रचार-प्रसार पर बल देते हुए नई पीढ़ी को उर्दू से जोड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जौनपुर का उर्दू साहित्य से गहरा संबंध रहा है और उन्होंने उर्दू के प्रति अपने विशेष लगाव का भी उल्लेख किया।
कार्यक्रम के आरंभ में आयोजन समिति की ओर से सभी अतिथियों का पुष्पगुच्छ भेंट कर तथा विशेष सम्मान प्रदान कर स्वागत किया गया।
मुशायरे की अध्यक्षता अहमद निसार जौनपुरी ने की, जबकि संचालन का दायित्व पत्रकार अजवद कासमी ने निभाया।
विशिष्ट अतिथियों में अरशद खान (पूर्व विधायक), डॉ. सरफराज खान, परवेज आलम भट्टो, डॉ. शकील अहमद, सैयद मसूद मेहदी, कलीम अहमद, डॉ. नौमान खान, शहनवाज मंजूर, आरिफ खान, निखिलेश सिंह, मेहदी रज़ा एडवोकेट, दिलीप तिवारी, आरिफ हबीब खान, निसार अज़ीजुद्दीन, अबूज़र शेख, डॉ. सैफ हुसैन खान, अब्दुल हलीम सिद्दीकी, इम्तियाज़ नदवी, डॉ. अर्शी, सामाजिक कार्यकर्ता सईद हाशमी (लखनऊ) आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
कार्यक्रम को सफल बनाने में सलीम खान, साजिद अलीम, शमशाद खान, अहमद मुदब्बिर, ज़फर अहमद, आज़म तथा समस्त समिति सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अंत में संयोजक अहमद ताहा खान ने सभी अतिथियों एवं उपस्थित जनसमूह का आभार व्यक्त किया।

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